सोमनाथ

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भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद द्वारा, ११ मई १९५१ को सोमनाथ मंदिर में शिव ज्योतिर्लिंग स्थापित किया गया.

प्रथमः ये ज्योतिर्लिंग चन्द्र (सोम) देव द्वारा स्थापित किया गया था जिसका वृतांत ऋग्वेद, स्कंद्पुराण, और शिवपुराण में मिलता है. उसके बाद दूसरा ज्योतिर्लिंग वल्लभी नरेश द्वारा पुनः निर्माण कराया गया, जिसे अरब के गवर्नर अल – जुनैद ने अपने गुजरात आक्रमण के समय (७२५ ईसा ) नष्ट कर दिया. नागभट द्वितीय (गुर्जर – प्रतिहार) द्वारा इसका तीसरी बार ८१५ ईसा के लगभग पुनः निर्माण कराया गया.

१०२४ में गुजरात में भीमदेव सोलंकी का राज था, उस समय तुर्क से मोहम्मद गज़नवी ने गुजरात पर लूट के इरादे से आक्रमण किया, और सोमनाथ मंदिर से बहुत सा धन लूट कर ले गया, उसके बाद कुमारपाल ने पुनः इसका निर्माण कराया और सोने चांदी से इसकी सोभा और बढ़ा दी.

१२९९ में अल्लाउद्दीन खिलज़ी की फ़ौज ने फिर आक्रमण किया, तब गुजरात में करण वाघेला का राज था, करण राजा युद्ध में हारा और अल्लाउद्दीन की फ़ौज ने सोमनाथ मंदिर नष्ट कर दिया, और सारा धन लूट कर ले दिल्ली ले आया.

१३०८ में महिपाल चुडास्मा प्रथम द्वारा फिर मंदिर निर्माण कराया गया.

१४वि सदी के अंत तक गुजरात में सुल्तानी राज आ चूका था, १३९५ ज़फरखान ने सौराष्ट्र पर हमला किया.  इसी तरह सोमनाथ को अरब, तुर्क और मुघल फ़ौज ने कुल १७ बार लूंटा.

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सोमनाथ मंदिर के अवशेष

सौराष्ट्र जिसे सोरठ और काठियावाड़ भी कहते हैं, खंभात और कच्छ की खाई के बीच की भूमि, जहाँ कई वीर क्षत्रियों ने जन्म लिया, कई संतो ने अपने ज्ञान से इस भूमि को पवित्र किया, जहाँ के चारण आज भी बहुत गर्व से सोरठ भूमि की गाथा कहते हैं.

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हमीर जी गोहिल , सोमनाथ मंदिर के सामने की प्रतिमा 

सोरठ भूमि का गोहिलवाड, अमरेली जिले के लाठी में भीमजी गोहिल के यहाँ हमीर जी गोहिल का जन्म हुआ . बचपन से ही बहादुर हमीर जी, एक बार खाना खा रहे थे तब इन्हें इनकी भाभी द्वारा ये पता चला की विदेशी आक्रमण कारी सोमनाथ मंदिर लूटने आ रहे हैं. इनकी भाभी ने ताना मारते हुए कहा, आज सोरठ की भूमि पे कोई भी ऐसा क्षत्रिये खून नही बचा, जो विदेशी आक्रमणकारियों  का सामना करके उनसे सोमनाथ मंदिर की रक्षा कर सके. हमीर गोहिल का क्षत्रिय खून खौल उठा, उनसे ये ताना वर्दास्त नही हुआ, और खाने से उठकर, उन्होंने प्रतिज्ञा ली की जीते जी सोमनाथ किसी विदेशी को लूटने नही दूँगा. भाभी को अपनी गलती का अहसास हुआ, उन्होंने उसे रोकने की कोशिश भी की पर वो नही रुके, और अपने साथ दुसरे २०० वीर लोगों को लेकर सोमनाथ की तरफ चल पड़े.

रास्ते में एक जगह विश्राम करते समय इनके कान में मरशिया (वीरों के मरने पर गाये जाने वाले गीत) गीत सुनाई दिया, हमीरजी ने देखा एक बूढी माँ गीत गा रही हैं, उन्होंने पास जाकर पूछा आप किसका मर शिया गा रही हो बा, बूढी माँ बोली अपने बेटे का, अभी १५ दिन पहले ही उसका स्वर्गवास हुआ है. हमीर जी ने कहा बा आप अपने पुत्र का मरशिया गा रहे हो उसी तरह मेरा मरशिया गाओगे, मुझे मरने से पहले अपना मरशिया सुनना है.

बा बोली बेटा, ये क्या कह रहे हो ? एक जवान जिन्दा मर्द का  मरशिया गाकर मुझे पाप का भागीदार नही बनना. हमीर जी ने कहा , मैं घर से प्रतिज्ञा लेकर निकला हूँ की जीते जी सोमनाथ विदेशियों को लूटने नही दूंगा, वहां सुल्तान ज़फर की फ़ौज है और यहाँ हम सिर्फ २०० लोग, मरना तो निश्चित है, तो आप बिना किसी संकोच के मरशिया गाओ बा. बा ने कहा सोमनाथ की रक्षा के लिए निकले हो, मैं वहीँ जा रही हूँ, तुझ से पहले पहुचुंगी वहां जाकर देखूंगी की तू किस वीरता से लड़ता है, उस तरह से ही तेरे मरशिया गाऊँगी, और बा सोमनाथ के लिए निकल गयीं.

आगे गिर के जंगल से गुज़रते  समय हमीर जी गोहिल का सामना जंगल में रहने वाले भीलों से हुआ, भीलों को जब ये मालूम हुआ कि ये नौजवान दल सोमनाथ मंदिर की रक्षा के लिए इस ओर आया है, तो उन्होंने उनका बड़ा स्वागत किया. भील सरदार वेगडा जी भी अपने ३०० भील बंधुयों के साथ इस दल में शामिल हो गए और उन्होंने भी सोमनाथ की रक्षा की कसम ली. भील सरदार वेगडा जी की बेटी से हमीर जी का विवाह हुआ, और उस दिन वहां बहुत खुशी मनाई गयी.

अगले दिन सब अपने हथियारों सहित सोमनाथ मंदिर, प्रभास तीर्थ की और बढ़ चले. वहां पहुंचकर प्रभास का बाहरी क्षेत्र वेगडा जी ने संभाला और मंदिर का क्षेत्र हमीर जी ने अपने हाथों में लिया.

ज़फर खान की सेना जब प्रभास पहुंची तो उनका सामना पहले वेगडा जी भील से हुआ, वेगडा जी भील और उनके भील सिपाहियों ने जमकर टक्कर ली और तीर कमान से तोपों का सामना किया, पर जफ़र खान ने तोपों के गोले उन पर बरसाना चालू रखा, अंत में सभी भील सिपाही सोमनाथ की रक्षा करते हुए शहीद हुए.

ज़फर खान की सेना भीलों से सामना होने के बाद आगे बढ़ी, यहाँ हमीर जी गोहिल से सामना हुआ, जफ़र खान की सेना बराबर तोपों से गोले बरसाती रही फिर भी हमीर जी गोहिल ने ९ दिनों तक डटकर सामना किया. अंत में हमीर जी ने केशरिया करने का निर्णय किया, और सबको युद्ध रचना समझा दी, सब वीरों ने केशरिया साफा सर पे बांधा और किले के दरवाजे खोल कर सब मैदान में आ गए. सब ने वीरों की तरह मैदान में रण कौशल दिखाया, और जब तक लड़ सकने की एक भी उम्मीद उनके आखरी खून की बूंद में रही वे लड़े, अंत में सिर्फ हमीर जी बचे. ज़फर खान ने अपनी सेना को हमीर जी को चारों और से घेरने का हुक्म दिया, सारी सेना अब हमीर जी को घेर कर उनपर वार करने लगी, और लड़ते लड़ते उस वीर ने भी वहीँ, सोमनाथ की शरण में प्राण त्याग दिए.

उसके बाद ज़फर खान सोमनाथ मंदिर को लूटकर, फिर से उसे ध्वस्त करके अपनी राजधानी लौट गया.

चारण कहता है …….

જનની જણતો ભગત જણજે, કા આવા શુરવીર અને કા દાતાર, નહિતર રહેજે વાંજણી, મત ગુમાવીશ તારૂ નુર.

 

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बचपन और दंगे

२७ फ़रवरी बुधवार का दिन था, आखिर के दो घंटे स्कूल के बच्चों को खेल के मिले थे, मैदान में वो जमकर फुटबॉल खेल रहे थे, आने वाले कल की बात से अनजान. अब्दुल ने अमन को चिल्लाते हुए कहा – ढंग से पास किया कर तेरी बॉल आधे तक भी नही पहुँच पाती, दोनों में थोड़ी नोक झोंक हुई, जो हर रोज़ का था.

आज सुबह जब ७:३० बजे ये लोग प्रार्थना करने के लिए सभा गृह में मिले थे, तब इन्होंने साथ मिलकर हाथ जोड़कर ये प्रार्थना की थी, “भारत हमारा देश है, हम सब भारतवासी भाई बहन हैं” , फिर भाइयों के बीच तो छोटी मोटी नोक झोंक होती रहती है. लंच ब्रेक में सारे दोस्त मिलकर घेरा बनाकर, लंच किया करते थे, स्कूल छूटने पर सब साथ साइकिल पर घर को निकलते थे, पर आज से सब बदलने वाला था, आज के बाद ये शायद अब ये फिर कभी ऐसे नही मिलने वाले थे.

जब ये सब यहाँ प्राथना कर रहे थे, तब ठीक उसी समय अवधि में गोधरा स्टेशन पर, साबरमती एक्सप्रेस आकर रुकी, उसमे आज एक अलग ही भीड़ थी, सब में एक अलग उत्साह था. कारसेवक आज अयोध्या से अपने आराध्य  श्री राम के दर्शन करके लौट रहे थे, सब को ये उम्मीद थी की अब जल्द से जल्द मंदिर बन जायेगा. राम मंदिर मुद्दा देश के कानून में शायद सबसे लम्बे समय से फंसे कुछ मामलों में से एक है.

क्या है मुद्दा –

२३ अप्रैल १९८५, शाह बानो केस , सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वसम्मति से निर्णय में अपील को खारिज कर दिया और उच्च न्यायालय के फैसले की पुष्टि करते हुए शाह बानो के हक में जजमेंट देते हुए मोहम्मद खान को गुजारा भत्ता देने के लिए कहा. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पुरजोर विरोध किया. शाहबानो के कानूनी तलाक भत्ते पर देशभर में राजनीतिक बवाल मच गया. राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को मिलने वाले मुआवजे को निरस्त करते हुए एक साल के भीतर मुस्लिम महिला (तलाक में संरक्षण का अधिकार) अधिनियम, (1986) पारित कर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया.

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के ख़िलाफ़ जाकर, मुस्लिम धर्मगुरुओं को राजीव गाँधी ने ख़ुश कर दिया था, पर विपक्ष और देश की ज्यादातर जनता उनके इस फैसले से खुश नही थी.

अरुण नेहरु के सुझाव पर राजीव गाँधी ने १ फ़रवरी १९८६ को बाबरी मस्जिद के दरवाज़े खुलवा दिए, इस फैसले के बाद, सभी हिंदुओं को, जो इसे राम का जन्मस्थान मानते थे, वहां तक जाने की अनुमति मिल गयी और मस्जिद को एक हिंदू मंदिर के रूप में कुछ अधिकार मिल गया.

१५२८ में बाबर के सिपहसालार मीर बाक़ी ने बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया था. १७६६ – १७७१ के दौरान यूरोपीय मिशनरी जोसेफ टिफेन्थलर ने इस साईट के दौरे किये थे, इनके काम को १७८८ में  जोहान बर्नोली ने अनुवाद किया उस के अनुसार, औरंगजेब या बाबुर ने रामकोट किले को तोड़ दिया था, जिसमें हिंदू द्वारा राम का जन्मस्थान माना जाता है और उसकी जगह एक मस्जिद का निर्माण किया गया. ६ दिसंबर १९९२, बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया.

२७ फ़रवरी २००२ गोधरा, साबरमती ट्रेन स्टेशन छोड़ चुकी थी, अभी स्टेशन से कुछ दूर निकली थी की पास की मस्जिद के लाउड स्पीकर से शोर हुआ, और १००० से २००० की भीड़ ने ट्रेन पर पत्थर बाज़ी करनी शुरू कर दी, ट्रेन के अन्दर पेट्रोल में भीगे हुए लत्ते फेंके गए, चार रेल के डिब्बों को आग के हवाले कर दिया गया, जिसमे ५९ लोग जलकर राख़ हो गए. मरने वालों में २७ औरतें और १० बच्चे भी थे.

२८ फ़रवरी २००२, शहर भर में दंगे भड़क गए,गोधरा, अहमदाबाद गुजरात के लगभग सभी बड़े शहरों में दंगे का असर था. लगभग २००० लोगो का कत्ले आम हुआ, ज्यादा संख्या मुसलमानों की थी पर हिन्दू के भी कम नही मरे थे. दोनों तरफ का भारी नुकसान हुआ था.

२८ फ़रवरी २००२ , अमन घर से पूजा के लिए सुबह ६ बजे के लगभग फूल लेने निकला, जब वो फूल लेकर आ रहा था, तब उसने देखा की एक आदमी सड़क पे भागे जा रहा है उसके पीछे एक आदमी तलवार लेके दौड़ रहा है. चार रास्ते पे पहुँच के तलवार वाले आदमी ने उस आदमी के ऊपर तलवार का वार कर दिया, जिससे उस आदमी की वहीँ मौत हो गयी. १३ वर्ष का अमन जिसने ये दृश्य देखा सहम गया, घर आकर वो चुपचाप सो गया.

अगले दिन उसे पता लगा, स्कूल में वो जिस अब्दुल के साथ फुटबॉल खेलता है, जो उसकी टीम का कप्तान भी है, वो एक मुसलमान है. कक्षा ७ में पढ़ रहे अमन को स्कूल में कभी किसी ने नही बताया था कि मुसलमान भी कोई अलग धर्म हैं, वहां वो सबके साथ खेलता था, सभी तो अच्छे हैं, पर सब कह रहे हैं की मुसलमान बड़ा ख़राब होता है. स्कूल में तो सब कहते हैं अब्दुल की मम्मी आमलेट बहुत अच्छा बनाती हैं, अब्दुल भी फुटबॉल अच्छा खेलता है, मेरा दोस्त है, मुझे तो वो ख़राब नही लगता.

एक हफ्ते बाद स्कूल फिर से खुले, पर स्कूल में अब्दुल और मोईन नही थे, दोनों ने स्कूल छोड़ दी थी, और अपने ही नज़दीक की बस्ती में एक स्कूल में पढने लगे थे. अब जब फुटबॉल का मैच होता, तो अब्दुल की कमी खलती थी. दूसरी टीम को भी मोईन की कमी खलती थी, पर वे दोनों अब हमारे साथ फुटबॉल खेलने नही आने वाले थे. अमन को इन सब में एक बात समझ आ रही थी कि धर्म होता है, और उसके नाम पे दंगे होते हैं, जिसमे दोस्त बिछड़ जातें हैं, और दुश्मन बन जाते हैं. आज से पहले उसके लिए धर्म का कोई मतलब नही था, आज से वो धर्म को जानने की कोशिश करने लगा है.

धर्म के नाम पे दंगे होते हैं, बहुत सी जाने चली जाती हैं, बहुत से दोस्त बिछड़ जाते हैं, बहुत से दुश्मन हो जाते हैं, पर मिलता कुछ नही, सब सुने रह जाते हैं.

अयोध्या मुद्दा आज भी अटका पड़ा है, सर्वोच्च न्यायालय में पक्ष – प्रतिपक्ष आज भी अपनी अपनी दलीलें पेस कर रहे हैं. राम मंदिर बनेगा ये सुनिश्चित हो गया है, कब बनेगा ये अभी सुनिश्चित नही हुआ.

 

महारानी पद्मिनी

रानी पद्मिनी जी को लेकर लोगों में ये भ्रम फैलाया जा रहा है की वो एक काल्पनिक पात्र हैं, और मालिक मोहम्मद जयसी के दिमाग की उपज हैं. इस बात को प्रमाणित करने के लिए वो कहते हैं की ‘अमीर खुसरो’ जो की अलाउद्दीन खिलज़ी के साथ उस सैनिक अभियान में था जिसने चित्तोड़ दुर्ग पर घेराव डाला था, उसने कहीं भी रानी पद्मिनी जी का जिक्र नही किया है अपने काव्यों में.

सतीश चंद्रा अपनी किताब ‘मध्यकालीन भारत भाग प्रथम’ में ये लिखते हैं कि अलाउद्दीन खिलज़ी के रणथम्भौर दुर्ग अभियान के वक़्त राजपूत स्त्रियों ने जौहर किया था, और मर्दों ने साका. सतीश चंद्रा इस बात की पुष्टि करते हैं कि अमीर खुसरो ने भी रणथम्भौर दुर्ग में हुए जौहर का जिक्र अपनी रचनाओं में किया है. जब रणथम्भौर में हुये जौहर का जिक्र अमीर खुसरो ने किया है, तो चित्तोड़ में हुये जौहर का जिक्र उसने क्यों नही किया, इसी  बात की बहस है.

इसी बात का फ़ायदा उठा कर जावेद अख्तर और इरफ़ान हबीब, रानी पद्मावती को जयसी के दिमाग की उपज कहते हैं, उनका मत है की रानी पद्मावती नाम का पात्र इतिहास में था ही नही, रानी पद्मावती काल्पनिक हैं.

अमीर खुसरो रणथम्भौर में हुए जौहर की पुष्टि करते हैं, क्योंकि वहां अलाउद्दीन के इतिहास को शर्मिंदा होना पड़े ऐसा वाक़या नही हुआ था.

आठ महीने के घेराव के कारण  चित्तोड़ क़िले का रसद पानी ख़तम हो चला था, इसलिए शांति वार्ता के लिए महाराज ने खिलज़ी से शांति वार्ता की पहल की, जहाँ छल से खिलज़ी ने महाराज का अपहरण कर लिया. इस आठ महीने के घेराव में खिलज़ी ने शायद किसी के मुंह से रानी सा की सुंदरता का वर्णन सुन लिया होगा, उसने महाराज को छोड़ने की शर्त रखी की, रानी पद्मिनी को उसे दे दिया जाये तभी वो महाराज को छोड़ेगा. (आईने में चेहरा दिखाने की बात झूठी गठी गयी है)

यहाँ रानी पद्मिनी को जब इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने, छल का बदला छल से लेने की ठानी, और गोरा को बुला भेजा. गोरा बादल से सारी योजना पे चर्चा करके, उसे अमली जामा पहनाने का दिन नक्की किया गया.

नक्की किये हुए दिन ७०० डोलो में सजा रानी पद्मिनी का डोला , खिलज़ी के तम्बू की ओर चला. जब खिलज़ी के द्वार पर डोला पहुचा तो गोरा ने महाराज को छोड़ने की बात कही. खिलज़ी ने महाराज को छोड़ दिया. जब महाराज खिलज़ी के तंबू से काफी दूर चले गए, तब उन ७०० डोलो में बैठे वीर सिपाहियों ने एकाएक खिलज़ी सेना पर आक्रमण कर दिया.

वहां महल में रानी पद्मिनी ने महाराज का स्वागत किया, यहाँ गोरा बादल ने खिलज़ी की सेना के हजारों सिपाहियों का सर्वनाश कर डाला.

इस शर्मनाक हार को खिलज़ी पचा नही पाया, क्योंकि उसने अभी तक अपनी सारी शर्तो पर विजय पाई थी, पहली बार उसने मात खायी तो वो उससे वर्दाश्त नही हो रही थी. खिलज़ी जैसा क्रूर शासक इस बात से किसी से नज़रे नही मिला पा रहा था, तो उसका दरबारी कवि इस शर्मनाक हार को अपनी रचनाओं में कैसे लिखता.

इस हार से खिलज़ी बहुत खिन्नाया हुआ था, और ये शर्मनाक हार उसे रानी पद्मिनी ने दी थी, इसलिए उसके सामने रानी पद्मिनी का जिक्र करने की किसी की हिम्मत नही हुई, यही कारण है की उस समय के इतिहास में रानी पद्मिनी का जिक्र नही मिलता.

पर भारत का इतिहास रहा है की वो अपना इतिहास श्रुति और स्मृतियों में याद रखता है, ऐसा ही कोई सिपाही खिलज़ी सेना में रहा होगा, जिसने इस कहानी को जीवंत रखा, और एक सदी बाद , जयसी ने जब ये कहानी किसी से सुनी तो उसने ‘पद्मावत’ की रचना की.

जैसा की उस समय का युग था, वहां दोहे और पद में ऐतिहासिक रचनायें लिखी जाती थी, और दोहों में लोग अतिशयोक्ति का भरपूर उपयोग करते हैं, मालिक मोहम्मद जयसी ने भी वही किया, और तोते हिरामनी को उसमे जोड़कर, इस महाकाव्य को परियों की कथा की तरह बना दिया.

खिलज़ी बदले की आग में जल रहा था, उसने चित्तोड़ पर पूरी ताकत से आक्रमण कर दिया, क़िले की दीवारें काफी मजबूत थी, उन्हें गिराना बहुत ही मुश्किल काम था. खिलज़ी ने क़िले के सामने मिट्टी का टीला बनवाया और उस पर तोप रखवा कर क़िले के अंदर गोले गिराना शुरू किया.

माँ पद्मिनी ने जौहर व्रत करने का फैसला लिया, और जय भवानी के शोर से दुर्ग हिल ने लगा. यहाँ महल की स्त्रियों ने जौहर व्रत किया, वहां पुरुषों ने दुर्ग के द्वार खोल दिए, और साका व्रत का पालन करते हुए अपनी अंतिम सांस तक लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुए.

खिलज़ी जब विजयी होकर दुर्ग के अंदर दाखिल हुआ तो वहां उसे सिर्फ राख़ का ढेर मिला, माँ पद्मिनी से अपनी हार का बदला लेने की उसकी चाह अधूरी रह गयी.

चित्तोड़ में मिली इस दूसरी करारी हार से खिलज़ी पूरी तरह से पागल हुआ जा रहा था, इसलिए चित्तोड़ की गद्दी पे अपने बेटे को बिठा कर, वो ताबड़तोड़ दिल्ली भाग गया.

अमीर खुसरो खिलज़ी का ग़ुलाम था, ना की कोई इतिहास कर, वो उतना ही लिखता था जितनी उसकी मालिक की खुशी हो, और उसके मालिक ने चित्तोड़ में मिली इस हार का जिक्र करने तक को सबको मनाही कर रखी थी. इस करारी शिकस्त को खुसरो चाह कर भी नही लिख सकता था.

हिन्दी को आज की पीढ़ी बातचीत में शामिल करने में शर्म महसूस करती है, और अंग्रेजी को कूल लैंग्वेज बना कर दिन भर उसका ही प्रचार करती रहती है. हमे तो अंग्रेजी भाषा कभी रास नही आई, जबकि शुरू से ही हमारा अभ्यास अंग्रेजी भाषा में ही हुआ है, फिर भी हम बहुत कम ही अंग्रेजी बोलते या लिखते हैं, अब इसको कोई यूँ कहे की हमे अंग्रेजी नही आती इसलिए हम ऐसा करते हैं, तो ये उनकी अपनी सोच है, बाकी हमने १४ साल जिस भाषा को पढने में और लिखने में और अपने अभ्यास में दिन रात उपयोग में लिया वो भाषा हमे ना आए ऐसा तो हो ही नही सकता.

आज हिंदुस्तान में जो शीर्ष पर बैठे हैं, वे सभी हिंदी भाषा के प्रशंसक है, उनमें सबसे पहले है हमारे प्रधानमंत्री जिनके हिन्दी में दिए भाषण काफी चर्चा में रहते हैं और लोगो को प्रोत्साहित करते हैं.

अमिताभ बच्चन, कंगना रानौत , कपिल शर्मा, कुमार विश्वास, ये सारे अपने क्षेत्र में सबसे शीर्ष पर हैं , और सारे ही ज्यादातर हिंदी में ही वार्तालाप करते हैं, और इन्होंने अंग्रेजी को ठेंगा दिखाया हुआ है.

Bahubali:The Conclusion 

राजामौली जी का धन्यबाद करना चाहूंगा जो उन्होंने अपनी मूवी #BahubaliTheConclusion में भारत के गौरव शाली इतिहास को दिखाया , वरना पिछले 50 – 60 सालों से #Bollywood भारत के इतिहास को नीचा दिखाने की कोशिश में ही रहा है। विदेशो के Locations दिखाना विदेशी पौशाक को ही सही बताना और विदेशी दिनचर्या की ही वकालत करना यही काम चल रहा था। 

अपने गौरव शाली इतिहास का मजाक बनाना , जिन्होंने देश भक्ति फिल्मे बनाई उनका मजाक बनाना , माननीय मनोज कुमार जी का मजाक बनाया गया , मोहम्मद रफी जी का मजाक बनाया गया। अभी हाल ही में जब अक्षय कुमार को राष्ट्रीय पुरष्कार से सम्मानित किया गया , तब कई बॉलीवुड हस्तियों के पेट का पानी हिल गया।
बॉलीवुड में बहुत से लोग वामपंथ की विचारधारा से जुड़े हुए है , वे कभी नही चाहते कि भारत का गौरवमयी इतिहास किसी को बताया जाए , वे इस इतिहास का तिरस्कार करते है और हमारे देवी देवता का उपहास उड़ाते है।

क्षत्रिय समाज को इन्होंने बलात्कारी , डाकू इसी रूप में पेश करने की कोशिश की हमेशा। जिस क्षत्रिय समाज ने देश की अखंडता कायम रखने के लिए इसे अपने बलिदानो से सींचा था उन्हें इन्होंने सिर्फ बलात्कारी बनाके पेश किया। पर ये कुत्ते लोग है आज ये भारतीय सिपाही को भी बलात्कारी कह रहे है जो सिमा पे सिर्फ इसलिए लड़ रहा है क्योंकि हम सुरक्षित रहे। जब इन्होंने जो वर्तमान मे इनकी रक्षा कर रहा है उसकी ही इज़्ज़त नही की तो ये जो भूतकाल में इनकी रक्षा करके इनको यहां तक लाये उनकी इज़्ज़त क्या करेंगे।

वामपंथी

आज नेट पे कुछ वामपंथी विचारधारा पे लेख पढ़ रहा था , जानने को मिला ये सब नास्तिक होते है और किसी धर्म को नही मानते , कट्टरवादी विचारधारा के खिलाफ इन्होने कई आन्दोलन किये और गणतंत्र का समाजवाद का नारा दिया. इनके प्रवक्ता मार्क्स ने कहा था ‘ धर्म लोगो के लिए अफीम के सामान हे ‘.

ये लोग अपने को कट्टरवादी विचारधारा के खिलाफ बोलते है , पर ये लोग खुद कट्टरवाद अपनाते है आप इनके सामने वामपंथ के खिलाफ कुछ नही कह सकते.

अब इनकी कुछ सच्चाई उजागर करते है , इनका भी एक धर्म है , और इनके प्रमुख धार्मिक गुरु या भगवान् कह लो वो है मार्क्स , एंगल्स , और लेनिन. इनके धार्मिक स्थल है मास्को और क्रेमलिन , और इनकी धार्मिक किताब है दस कैपिटल्स (स्वार्थ २०१३ की एक पोस्ट से). ये किताब को १०० साल से ज्यादा हो गए है पर अभी तक इसमें कोई परिवर्तन नही किया गया है , १०० साल में दुनिया कहा से कहा चली गयी पर ये अभी तक यही अटके हुए है.

नक्सलवाद जो आज एक बीमारी बन गया है हिंदुस्तान के लिए वो इन्ही की देन है , ये कहते है नक्सली लोग गरीब है ,अशिक्षित है , ये आदिवासी है , इनका बाहरी दुनिया से संपर्क कटा रहता है , इनका सोसन होता रहता है, इनकी बहुत सी समस्याएँ है इसलिए इन्होने हथियार उठा लिए है. सरकार ने इनका सही से विकास नही किया.

अगर ये गरीब है तो इनके पास विदेशी हथियार खरीदने के पैसे कहा से आते है , अगर ये अशिक्षित है और बाहरी दुनिया से अनजान है तो माओ वाद और मार्क्सवाद का ज्ञान कहा से आया इनके पास , इन्हें सपना आया था क्या. जो लोग इन्हें हथियार देते है मार्क्सवाद का ज्ञान देते है वे लोग इन्हें शिक्षा भी दे सकते थे और इनकी गरीबी भी दूर कर सकते थे. पर उन्हें अपना धर्म का विस्तार करना था और इन सीधे सादे आदिवासियों के अलावा उन्हें और कौन मिलेगा धर्म का विस्तार करने को.

हिन्दू धर्म को ये अपना सबसे बड़ा शत्रु मानते है , क्यूंकि इस धर्म के सामने इनकी विचारधारा फिक्की पड़ जाती है, ये धर्म स्वयं अपनी कमियों को पहचान कर उन्हें दूर करने की ताकत रखता है. कट्टरपंथ इसमें जन्मा था फिर शांत भी हुआ और तरक्की की रहो पर ये देश को लेके भी गया. इसी धर्म के एक वैज्ञानिक ने धरती पे बेठे बेठे चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण का रहस्य बताया था , और इसी ने पृथ्वी और सूर्य के बिच की दूरी भी नापी थी. कुछ कमियाँ रही जो धीरे धीरे दूर होती जा रही है , और जो बाकि रह गयी है वे भी जल्दी ही दूर हो जाएँगी.

इस वामपंथी विचारधारा को हराना है तो समाज को शिक्षित करना होगा , गरीबी दूर करनी होगी, द्वेषभाव हटाने होंगे, जातिवाद ख़तम करना होगा , ये सब इनकी उपज है और ये कभी नही चाहेंगे की ये ख़तम हो , इसलिए हमे इन्हें ख़तम करना होगा वामपंथ अपने आप ख़तम हो जायेगा.