चतुर्थ विद्या

 

Chanakya_artistic_depiction

चाणक्य ने चतुर्थ विद्या की बात कही है, प्राचीन भारत में तक्षिला नामक विश्व विद्यालय के महान शिक्षक व गुरु चाणक्य, अपने समय के महान व्यक्तियों में से थे. उन्होंने जो ठाना वो करके ही दम लिया.
चतुर्थ विद्या का ज्ञान जिसके बल पर उन्होंने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की, और अर्थशास्त्र नामक ग्रंथ की रचना की, जो आज भी सर्वाधिक प्रसिद्ध है, और विश्व की हर यूनिवर्सिटी में इसको लेकर रिसर्च होती रहती हैं.

चतुर्थ विद्या क्या थी …
१. आन्वीक्षिकी (विचारशास्त्र)
२. त्रयी (३ वेद, चाणक्य के समय तक तीन ही
वेद थे, अथर्ववेद बाद में जुड़ा)
३. वार्ता (अर्थशास्त्र)
४.दंडनीति (राजनीति)

चाणक्य ने सर्वाधिक महत्व आन्वीक्षिकी विद्या को दिया, विचारों को ज्यादा महत्व देने का कारण था, व्यक्ति जैसा आचरण करता है, उसका वैसा स्वभाव बनने लगता है, आचार्य चाणक्य चन्द्रगुप्त मौर्य को चक्रवर्ती सम्राट बनाना चाहते थे, इसलिए बचपन से ही उन्होंने उसके विचारों में सम्राट के दर्शन करवाये.

विचारों को आगे विस्तार देते हुये, उन्होंने उसे तीन रूप दिए,
१. संख्या
२. योग
३. लोकायत

संख्या का ज्ञान होने से चीज़े सरल होने लगती हैं, संख्या का ज्ञान सबसे पहल पहल कपिल मुनी द्वारा दिया गया.

योग करने से मस्तिष्क शांति प्राप्त करता है, और हमारी सोचने की शक्ति को बल प्रदान करता है.

लोकायत , चार्वाक दर्शन शास्त्र को लोकायत भी कहते हैं, जिसका अर्थ होता है, जो प्रत्यक्ष है, उसे मानना, ये भौतिकवादी नास्तिक दर्शन को बतलाता है. जो इश्वर में विश्वास नही रखते, स्वयं के बल पर कार्य करने की क्षमता को बल देते हैं. चाणक्य निरीश्वरवाद के विचारों को भी महत्व देते थे.

विचारों के बल से ही आगे की तीन विद्या को सीखा जा सकता है, और सफलता प्राप्त की जा सकती है.

प्रदीपः सर्वविद्यानां उपायः सर्वकर्मणाम्।
आश्रयः सर्वधर्माणां शश्वद् आन्वीक्षिकी मता॥
( अर्थ: आन्वीक्षिकी सभी विद्याओं की शाश्वत प्रदीप है, सभी कार्यों का शाश्वत साधन है, और सभी धर्मों का शाश्वत आश्रय है।)

Advertisements