महारानी पद्मिनी

रानी पद्मिनी जी को लेकर लोगों में ये भ्रम फैलाया जा रहा है की वो एक काल्पनिक पात्र हैं, और मालिक मोहम्मद जयसी के दिमाग की उपज हैं. इस बात को प्रमाणित करने के लिए वो कहते हैं की ‘अमीर खुसरो’ जो की अलाउद्दीन खिलज़ी के साथ उस सैनिक अभियान में था जिसने चित्तोड़ दुर्ग पर घेराव डाला था, उसने कहीं भी रानी पद्मिनी जी का जिक्र नही किया है अपने काव्यों में.

सतीश चंद्रा अपनी किताब ‘मध्यकालीन भारत भाग प्रथम’ में ये लिखते हैं कि अलाउद्दीन खिलज़ी के रणथम्भौर दुर्ग अभियान के वक़्त राजपूत स्त्रियों ने जौहर किया था, और मर्दों ने साका. सतीश चंद्रा इस बात की पुष्टि करते हैं कि अमीर खुसरो ने भी रणथम्भौर दुर्ग में हुए जौहर का जिक्र अपनी रचनाओं में किया है. जब रणथम्भौर में हुये जौहर का जिक्र अमीर खुसरो ने किया है, तो चित्तोड़ में हुये जौहर का जिक्र उसने क्यों नही किया, इसी  बात की बहस है.

इसी बात का फ़ायदा उठा कर जावेद अख्तर और इरफ़ान हबीब, रानी पद्मावती को जयसी के दिमाग की उपज कहते हैं, उनका मत है की रानी पद्मावती नाम का पात्र इतिहास में था ही नही, रानी पद्मावती काल्पनिक हैं.

अमीर खुसरो रणथम्भौर में हुए जौहर की पुष्टि करते हैं, क्योंकि वहां अलाउद्दीन के इतिहास को शर्मिंदा होना पड़े ऐसा वाक़या नही हुआ था.

आठ महीने के घेराव के कारण  चित्तोड़ क़िले का रसद पानी ख़तम हो चला था, इसलिए शांति वार्ता के लिए महाराज ने खिलज़ी से शांति वार्ता की पहल की, जहाँ छल से खिलज़ी ने महाराज का अपहरण कर लिया. इस आठ महीने के घेराव में खिलज़ी ने शायद किसी के मुंह से रानी सा की सुंदरता का वर्णन सुन लिया होगा, उसने महाराज को छोड़ने की शर्त रखी की, रानी पद्मिनी को उसे दे दिया जाये तभी वो महाराज को छोड़ेगा. (आईने में चेहरा दिखाने की बात झूठी गठी गयी है)

यहाँ रानी पद्मिनी को जब इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने, छल का बदला छल से लेने की ठानी, और गोरा को बुला भेजा. गोरा बादल से सारी योजना पे चर्चा करके, उसे अमली जामा पहनाने का दिन नक्की किया गया.

नक्की किये हुए दिन ७०० डोलो में सजा रानी पद्मिनी का डोला , खिलज़ी के तम्बू की ओर चला. जब खिलज़ी के द्वार पर डोला पहुचा तो गोरा ने महाराज को छोड़ने की बात कही. खिलज़ी ने महाराज को छोड़ दिया. जब महाराज खिलज़ी के तंबू से काफी दूर चले गए, तब उन ७०० डोलो में बैठे वीर सिपाहियों ने एकाएक खिलज़ी सेना पर आक्रमण कर दिया.

वहां महल में रानी पद्मिनी ने महाराज का स्वागत किया, यहाँ गोरा बादल ने खिलज़ी की सेना के हजारों सिपाहियों का सर्वनाश कर डाला.

इस शर्मनाक हार को खिलज़ी पचा नही पाया, क्योंकि उसने अभी तक अपनी सारी शर्तो पर विजय पाई थी, पहली बार उसने मात खायी तो वो उससे वर्दाश्त नही हो रही थी. खिलज़ी जैसा क्रूर शासक इस बात से किसी से नज़रे नही मिला पा रहा था, तो उसका दरबारी कवि इस शर्मनाक हार को अपनी रचनाओं में कैसे लिखता.

इस हार से खिलज़ी बहुत खिन्नाया हुआ था, और ये शर्मनाक हार उसे रानी पद्मिनी ने दी थी, इसलिए उसके सामने रानी पद्मिनी का जिक्र करने की किसी की हिम्मत नही हुई, यही कारण है की उस समय के इतिहास में रानी पद्मिनी का जिक्र नही मिलता.

पर भारत का इतिहास रहा है की वो अपना इतिहास श्रुति और स्मृतियों में याद रखता है, ऐसा ही कोई सिपाही खिलज़ी सेना में रहा होगा, जिसने इस कहानी को जीवंत रखा, और एक सदी बाद , जयसी ने जब ये कहानी किसी से सुनी तो उसने ‘पद्मावत’ की रचना की.

जैसा की उस समय का युग था, वहां दोहे और पद में ऐतिहासिक रचनायें लिखी जाती थी, और दोहों में लोग अतिशयोक्ति का भरपूर उपयोग करते हैं, मालिक मोहम्मद जयसी ने भी वही किया, और तोते हिरामनी को उसमे जोड़कर, इस महाकाव्य को परियों की कथा की तरह बना दिया.

खिलज़ी बदले की आग में जल रहा था, उसने चित्तोड़ पर पूरी ताकत से आक्रमण कर दिया, क़िले की दीवारें काफी मजबूत थी, उन्हें गिराना बहुत ही मुश्किल काम था. खिलज़ी ने क़िले के सामने मिट्टी का टीला बनवाया और उस पर तोप रखवा कर क़िले के अंदर गोले गिराना शुरू किया.

माँ पद्मिनी ने जौहर व्रत करने का फैसला लिया, और जय भवानी के शोर से दुर्ग हिल ने लगा. यहाँ महल की स्त्रियों ने जौहर व्रत किया, वहां पुरुषों ने दुर्ग के द्वार खोल दिए, और साका व्रत का पालन करते हुए अपनी अंतिम सांस तक लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुए.

खिलज़ी जब विजयी होकर दुर्ग के अंदर दाखिल हुआ तो वहां उसे सिर्फ राख़ का ढेर मिला, माँ पद्मिनी से अपनी हार का बदला लेने की उसकी चाह अधूरी रह गयी.

चित्तोड़ में मिली इस दूसरी करारी हार से खिलज़ी पूरी तरह से पागल हुआ जा रहा था, इसलिए चित्तोड़ की गद्दी पे अपने बेटे को बिठा कर, वो ताबड़तोड़ दिल्ली भाग गया.

अमीर खुसरो खिलज़ी का ग़ुलाम था, ना की कोई इतिहास कर, वो उतना ही लिखता था जितनी उसकी मालिक की खुशी हो, और उसके मालिक ने चित्तोड़ में मिली इस हार का जिक्र करने तक को सबको मनाही कर रखी थी. इस करारी शिकस्त को खुसरो चाह कर भी नही लिख सकता था.

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